मुझे ये उपन्यास काफी अच्छी लगी. ध्रुव भट्ट द्वारा लिखित इस उपन्यास में नर्मदा नदी, और उसके आस पास रहने वाले व्यक्ती, मंदिर, आदिवासी जनजाती के बारे में बताया गया है. अपनी संस्कृती के महत्व को बताते हुए उसे बचाने की कोशिश के बारे में बताया गया है.. मुख्य पात्र की disbelief से belief की journey को बताया गया है...मैने इस उपन्यास का मराठी अनुवाद पढा है..उपन्यास की भाषा और एक एक पंक्ती मन पर छाप छोडते है... जैसे शास्त्री जी द्वारा कहा जाना की "धर्म में श्रद्धा नहीं हो तो भी चलेगा, पर श्रद्धा होनी चाहिये .सुप्रिया द्वारा कहा जाना की "मुझे सेवा करणी है परिक्रमा की न की परिक्रमावासी की"..
प्रमुख पात्र द्वारा कहा जाना की "सुख और आनंद में क्या अंतर है, वो इस जंगल ने बताया"...
जंगल में रहने वाले लोगों का रहन सहन, उनकी परंपरा, उनका विश्वास, उनका भोला पण भी बताया गया है
नर्मदा नदी की विशालता को बताया गया, तत्वमसी नर्मदा नदी के संदर्भ में लेते हुए तू ही ब्रम्ह है,इसका ऐसा अर्थ है
अंत में शायद नर्मदा नदी ने अपने दर्शन कथा के प्रमुख पात्र को दिये. जो हमे उपन्यास के अंत में समझ आता है. नायक की सारी दुविधा मिट जाती है.. उसे अपने में एक परिवर्तन का अनुभव होता है...
उपन्यास खुद को पा लेना, या अपना लक्ष्य को पाना, ये बताता है...
सभी को ये उपन्यास जरूर पढना चाहिये...