मैंने "द उदयपुर फाइल्स" अभी तक देखा नहीं है, किंतु मात्र इसके विषय-वस्तु की जानकारी ने ही अंतःकरण को झकझोर दिया है। यह कोई साधारण चलचित्र नहीं, अपितु एक दृष्टि-परिवर्तनकारी प्रस्तुति प्रतीत होती है, जो धार्मिक उन्माद के नाम पर हुई अमानवीय क्रूरता की निर्विकार अभिव्यक्ति है। यह फिल्म उन तथाकथित 'वामपंथी वैचारिक प्रवृत्तियों' पर तीव्र प्रहार करती है, जो प्रायः ऐसे ज्वलंत एवं असहज सत्यों से मुंह मोड़ लेने में ही अपनी सुविधाजनक प्रगतिशीलता समझती हैं।
यह चलचित्र सामाजिक विसंगतियों के मध्य एक प्रहरी की भांति खड़ा दिखाई देता है — यह स्मृति, विवेक और न्याय के लिए एक तटस्थ उद्घोष है, जिसमें न तो विद्वेष है और न ही पूर्वग्रह, अपितु एक तीव्र उत्कंठा है कि सभ्यता किसी भी प्रकार की वैचारिक कट्टरता की बलि बनकर मौन न हो जाए। ऐसे समय में जब फ़िल्म निर्माण केवल सौंदर्य और सतही विषयों तक सीमित होता जा रहा है, यह कृति विचारोत्तेजक विमर्श के द्वार खोलती है।
"द उदयपुर फाइल्स" केवल एक घटना का चित्रण नहीं – यह संवेदनाओं की पुनर्स्थापना का उपक्रम है; यह स्मृति का दायित्व है; यह उस वैचारिक आत्म-मंथन की माँग है जो आवश्यक भी है और अपरिहार्य भी। मैं इस फिल्म को देखने हेतु अत्यंत व्यग्र हूँ, क्योंकि यह न केवल सत्य का साहसिक अनावरण करती है, अपितु हमें आत्मावलोकन हेतु भी विवश करती है। यह फिल्म किसी प्रचार का उपकरण नहीं, बल्कि एक वैचारिक क्रांति का आमंत्रण है — निर्भीक, निर्लेप और निर्णायक।