डियर जिंदगी,
तुम सबकी अपनी अपनी हो! लेकिन सबकी एक जैसी भी हो। किसी भी सिनेमा, किताब या कहानी का, उसे महसूस किया जाना जरूरी है। दावे के साथ कहा जा सकता है कि 'डियर जिंदगी' जिंदगी को महसूस करने का वो सुखद क्षण है, जो सभी की लाइफ को अपने में समेटे है। डियर जिंदगी, जोर से रोने का, हंसने का, मुस्कुराने का, जी उठने का अहसास है।
गौरी शिंदे ने जिस इंटेंसिटी के साथ इसे लिखा, जीया और प्रस्तुत किया है, वो काबिले तारीफ है। कहते हैं सिनेमा तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तक वो जिस जोनर का है, उसे पूर्ण ना कर दे। मसलन, थ्रिलर है तो अंत तक सस्पेंस हो, रोमांटिक है तो प्यारा और खूबसूरत हो और मसाला है तो मसालेदार हो। लेकिन 'डियर जिंदगी' थोड़ी अलग है। कई फिल्में इमोशन को गले तक ले आती हैं, लेकिन ये गले से बाहर निकाल देती है।
सो (तो) डियर जिंदगी, अब चलते हैं, सीखते हैं, आगे बढ़ते हैं, लड़ते हैं, झगड़ते हैं, प्यार करना सीखते हैं। चलो जिंदगी! अब जीना सीखते हैं!