ये साहित्य का अनमोल ग्रन्थ है . इसे पढ़ते समय खुद को अदभुत लेकिन सच्ची दुनियां में पाते हैं .
पर व्यंग लिखने की सोचने वालों को रागदरबारी को कादपि नहीं पढ़ना चाहिये ,क्योंकि वो सोचेंगे वो श्रीलाल शुक्ल जी पहले ही इसमें लिख गए है . इस लिए नव व्यग लेखक इसे पढ़ कर कुंठित हो सकते नहीं .