अमिताभ बच्चन जिस फ़िल्म का हिस्सा हों उससे उम्मीदें ख़ुद ब ख़ुद बढ़ जाना बेहद स्वाभाविक है, और इन उम्मीदों पर झुंड फिल्म एकदम खरी भी उतरती है लेकिन जो बात इस फ़िल्म में हमें चौंकाती है वो है इस फ़िल्म के अन्य कलाकारों का अभिनय, जो कलाकार हैं भी या नहीं इसी असमंजस में सिनेमा हॉल में बैठा हर व्यक्ति अपने आपको प्रतीत करता है क्योंकि कुछ भी अभिनय जैसा है ही नहीं। जैसे सबकुछ यथार्थ है और इस कलाकारों का जीवन परिचय दिया जा रहा है। कमाई के मापदंडों को ये फिल्म पूरा कर पाएगी या नहीं कहना मुश्किल है लेकिन 'क्लासिक' शब्द इस फिल्म के साथ जुड़ चुका है जिसे एक नए सिनेमा की शुरुआत कहा जा सकता है। आज भी देश में एक आधार कार्ड बनाने के लिए साधारण व्यक्ति को कितनी जद्दोजहद से गुजरना पड़ता है देखकर लगता है कि क्या आज भी हम लोग प्रगतिशील की श्रेणी में आ पाते हैं। ये फिल्म हमें बताती है कि अगर हम चाहें तो ज्यादा न सही किसी एक व्यक्ति के जीवन में तो हम बदलाव ला ही सकते हैं, एक सुखद बदलाव और ये दिल को कितना सुकून भी दे सकता है। डायरेक्टर नागराज मंजुले की एक दीवार के अलग बगल दो अलग अलग दुनिया को दिखाने और इस दूरी को कम करने का प्रयास सराहनीय है । कुल मिलाकर एक अवश्य देखने योग्य फिल्म 👍