80 साल पुराने विश्वयुद्ध के “सुने-सुनाए” क़िस्सों पर बनी फ़िल्में कुछ लोगों के लिए “वक़्त के ज़रूरी दस्तावेज़” हैं लेकिन आँखों के आगे घटी एक “नंगी बेबस सच्चाई” पर फ़िल्म से लोग असहज हैं ? जल्दी देखेंगे फ़िल्म क्यूँकि सच उनके लिए हैं जिनमें उसे सहने की ताक़त है
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