फ़िल्म ठीक ठाक बनी है, आतंकवाद से जुड़े लोगों के तर्कों को यथार्थवादी तरीकेत से रखा गया है, पर ये फ़िल्म आतंकवाद के इस विचार के विपक्ष में कोई तर्क स्थापित नही करती। एक तरह से ऐसी फिल्में भटके युवाओं के लिए प्रेरणादायक बन सकती हैं। दो कौड़ी के आतंकवादियों पर बायोग्राफिकल फिल्में किस उद्देश्य से बनाई जाती हैं, इसे ध्यान में रखा जाना चाहिए। कल को ओसामा पर भी एक फ़िल्म आ जाएगी, जिसमे उसके आतंकी बनने की कहानी होगी, क्या ये स्वस्थ मनोरंजन है, क्या ये सुनहरे भविष्य की आशा जगाती फ़िल्म है या प्रेरणादायी।