इस फ़िल्म के लिए तीन शब्द वाहियात वाहियात वाहियात।
बेवजह का वॉइलेंस, पिता-पुत्र के इमोशन्स के नाम पर वॉइलेंस, औरतों को इस फ़िल्म में सम्मान के नाम पर आदमियों के लिए खिलोने की तरह दिखाया गया है, जो कि बहुत ही बेहूदापन है। कौन सा सीन कब शुरू हो जाएगा ये खुद डायरेक्टर भी ना बता पाए।
1. गुंडो की फौज आ जाती है, रणवीर कपूर अकेले लड़ता है, और उसके भाई बैकग्राउंड खड़े होकर गाना गाते हैं।
2. रणवीर अपने पिता जी को हीरो मानता है, लेकिन पूरे फ़िल्म में उसके पिता ने कभी उसको सपोर्ट नही किया। क्यों मानता है पता नही।
3. पूरे शरीर मे रणवीर को गोली लगी है लेकिन वो अपने व्यवहार से ये जताने की कोशिश करता हैं कि डॉक्टर बेवकूफ है।
4. रणवीर के मन मे इतना वॉइलेंस है कि उसको अपना हर काम सही लगता है। यहां तक कि पूरे घर मे वो अपने मम्मी-पापा, बहन, घर के नौकर, अपने दोस्तों के सामने नंगा घूमता है।
5.बॉबी देओल, को क्रूर दिखाने के चक्कर मे वो अपने एक साथी को साथी को मारता है, उसका निकाह हो रहा होता है,उसके बाद सबके सामने सुहागरात मनाता है।
ऐसे ही बहुत बेहूदा सीन है इस फ़िल्म में।