इब्नेबतूती को पढ़ने/महसूस की यात्रा शानदार है। कभी न ठहरने वाली शालू अवस्थी को यह नाम कुमार आलोक ने दिया। यात्रा 1990 से 2015 तक दिल्ली और लखनऊ शहर की सैर कराती है। इन दौर की मोहब्बतें भी आप समझ सकेंगे।
शालू जो राघव की माँ और पिता दोनों है,जो 1990 में 20 वर्ष लड़की थी के किरदार को महसूस करेंगे।माँ से प्यार होना दुनिया की सबसे साधारण बात है इसे पढ़ के आप माँ से और अधिक प्रेम महसूस करेंगे ।राघव पढ़ने अमेरिका जाने वाला है पर माँ अकेली हो जाएगी यह डर सता रहा है। कुमार आलोक 1990 में upsc का सपना बिना यह सोचे कि सेलेक्शन नही हुआ तो क्या होगा लेकर दिल्ली आए। 1993 में पहले प्रयास में आईएएस बने पर एक महीने में ही नौकरी छोड़ दी।
मंडल कमीशन के बाद देश के माहौल से आलोक घुट रहा था।नौकरी क्यों छोड़ी , वो 2015 में क्या कर रहे है , राघव अमरीका जा पाता है या नही के जबाब पढ़ने के बाद मिल जायेंगे ।
निशा और प्रोफेसर के किरदार साइड हीरो की तरह है ये क्यों कह सो कहानी में जानने मिलेगा ।
"तो अम्मा यार अब पढ़ ही डालो न"- राघव