एक बच्चा जब कोई सपना देखता है, समाज के प्रति कोई विचार या अपना कोई आदर्श बनाता है। तो वो हर पल बेचैन रहता है। नैतिकता की कसौटी पर अपने विचारों और आदर्शो को परखने की कोशिश करता है। और जैसे ही उसे अपने विचारों और आदर्शो के प्रति किसी अपने की स्वीकृति और थोड़ी सी भी सराहना मिलती हैं। तो उसका अपने पर विश्वास मक्कम हो जाता है। वो खुशी से झूम उठता है।
कुछ इसी तरह ही इस किताब ने प्रेम के प्रति मेरे आदर्शो और मूल्यों को अमुक स्वीकृति दे कर मुझे अटल विश्वास से भर दिया है। प्रेम के प्रति मेरे अंदर चल रहे अंतर्द्वं को धर्मवीर भारती की मार्मिक दर्शन की स्वीकृति ने मेरे अंदर के ना जाने कितने तूफानों को शमित कर दिया है। सुधा का पवित्र, निश्छल, सुकुमार स्नेह और संपूर्ण आत्मसमर्पण, चन्दर का अपने आदर्शो से अन्तर्द्वन्द, सुधा के प्रति पवित्र प्रेम , बिनती की ममता ने मेरे अंदर पवित्र प्रेम की अभिलाषा को दृढ़ करके मेरे पर बहुत बड़ा उपकार कर दिया है। अब सुधा के निष्पाप, अटल , पवित्र प्रेम रूपी अमृत को पुनः पुन: पढ़के में शायद अपने चरित्र के दागों को धो पाऊं।
नई पीढ़ी के हिंदी साहित्य रसिकों से मेरी प्राथना है कि इस किताब को जरूर पढ़े। धन्यवाद।