बचपन की यादों की बाढ़ सी आ गई
हम खेतों में रहते हैं, आजकल तो 24 घण्टे बिजली रहती है पर उस वक्त सिर्फ सुबह करीब 7ः30 से 4ः30 बजे तक ही लाइट आती थी। हमारा रोज का रुटीन था
सक लक बूम बूम, सोनपरी, शरारत, विकराल गबराल वगैरह देखते थे।
दिमाग पर इन का बहुत ज्यादा प्रभाव हुआ करता था, देखने के कई घण्टों बाद तक इनके बारे में सोचता रहता था। क्या दिन थे यार तब दुनिया की इतनी समझ नहीं थी हर नई चीज अजूबा ही लगती थी। माइ आइज आर लिटरलि फुल विद टियर्स. आइ कैन्ट इवन टाइप फरदर. लव यू ऑल.